आदिम युग सा जीवन जी रहे हैं शाक्टी – मरौड़ कर लोग

आदिम युग सा जीवन जी रहे हैं शाक्टी – मरौड़ कर लोग

आदिम युग सा जीवन जी रहे हैं शाक्टी – मरौड़ कर लोग
आदिम युग सा जीवन जी रहे हैं शाक्टी – मरौड़ कर लोग

डलहौज़ी हलचल (कुल्लू) विभूति चौधरी : कुल्लू जिला की सैंज घाटी में ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क के भीतर बसे शाक्टी मरौड़ गांव के पिछडेपन की अजब कहानी है। देश को रोशन करने वाली बिजली परियोजनाओं की नगरी सैंज घाटी में बसे इन गांवों में सरकारी सुविधा के नाम पर मात्र एक प्राथमिक पाठशाला है। हाईटेक युग में इन गांवों मोबाईल की घंटी नहीं बजती। गांव के लोग मुलभूत सुविधाओं के आभाव से आदिवासी सा जीवन यापन करने को मजबूर हैं।

सरकारें घर-द्वार शिक्षा, स्वास्थ्य, सडक, बिजली और पानी देने का दावा करती हैं। लेकिन, शाक्टी, मरौड़, मैल, मझाण और शुगाड़ गांवों की हालत सरकारी दावों को खोखला साबित करती हैं। बंजार विकास खंड की गाडापारली पंचायत के इन गांव में अभी तक सड़क और बिजली जैसी सुविधा नही मिल पाई है। आए दिन इस पंचायत से मरिजों को कुर्सी में डंडे बांधकर सडक तक लाना पड रहा है। गांव से सडक पंद्रह से बीस किमी दूर है। भारी बारीश हो या बर्फवारी, लोगों को पथरिले रास्तों से गुजरना मजबूरी बन गया है। पंचायत में आलम यह है कि स्वास्थ्य सुविधाओं और खाद्य सामग्री के लिए लोगों को मीलों दूर तक पैदल चलकर अपनी पीठ पर सामान लाना पड़ता है।

विश्व धरोहर साईट ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क के नियम यहां के विकास में बाधा बने हुए है। मरौड़ गांव तक पहुंचने के लिए लगभग नौ घंटे दुर्गम रास्तों से पैदल चलना ग्रामीणों की मजबूरी बन गई है। शत प्रतिशत विद्युतिकरण का दावा करने वाली सरकारें तीनों गांव में बिजली की व्यवस्था अभी तक नही कर पाई है। उच्च शिक्षा के लिए बच्चों को 40 किमी दूर सैंज जाना पडता है। ग्रामीण पेयजल के लिए प्रकृतिक जल स्त्रोतों पर निर्भर है।

 

जब कोई बीमार पडता है तो कुर्सी या चारपाई के सहारे सडक तक पहुंचाने पड़ते हैं मरीज 

गांव में जब कोई बीमार पडता है तो उसे कुर्सी या चारपाई पर उठाकर लाने के अलावा दूसरी कोई सुविधा नही है। सड़क सुविधा न होने के चलते मरीजों को दो डंडों के सहारे कुर्सी पर उठाकर मीलों सफर कर जंगला बिहाली में पहुंचाया जाता है। यहां से मरीज को वाहन के माध्यम सैंज अस्पताल ले जाना पड़ता है। सैज संघर्ष समिति के अध्यक्ष महेश शर्मा ने कहा कि समिति द्वारा कई बार प्रशासन के माध्यम से सरकार को ज्ञापन दिया, लेकिन सरकार इस पर कोई अमल नहीं कर रही है। ग्राम पंचायत गाड़ापारली की प्रधान यमुना देवी ने कहा कि पंचायत द्वारा लोक निर्माण विभाग को प्रस्ताव भी बनाकर भेजा गया है। 

 

देव नियम ही सर्वपरि

यहां के लोगों का रहना-सहन, खान-पान और तौर-तरीके भी अभी पारम्परिक हैं। देव आस्था में ग्रामीण परिपक्वता है। स्थानीय देवता श्री आदि ब्रम्हा और ध्रव ऋषि यहां के बाशिंदों के लिए सर्वोपरि हैं। इन देवताओं का आदेश ही इनके लिए सबकुछ है और देवता के बनाए कानून का अनुसरण होता है। शराब इन गांवों में पूरी तरह से निषेध है।

 

नही आता मोबाईल सिग्नल

यहां के लोगों की एक ही इच्छा है कि इन गांवों को मूलभूत सुविधाएं दी जाए। क्षेत्र के युवा बताते हंे कि गाडापारली पंचायत के शाक्टि-मरौड गांव के पिछडेपन की अजब कहानी है। जल बिजली परियोजनाओं की नगरी सैंज घाटी में बसे यह गांव में हाईटेक युग में भी मोबाईल सिग्नल से कोसों दूर है।

 

खासा कठिन है जीवन

मरौड गांव की फुला देवी, डोला सिंह, राम लाल, लगन चंद, हरादासी, तेज राम, भाग चंद, गोविंद, राम चंद, जीत राम, दुर्गी देवी और शुकरी देवी ने बताया कि गांव का जनजीवन खासा कठिन है। बिजली न होने से लकड जलाकर रोशनी करनी पडती है। हालांकि पंचायत ने बीते वर्ष गांव में सोलर लाईटें लगा कर कुछ राहत दी है लेकिन ग्रामीण अभी भी टीवी, रेडीयो और कंपुटर जैसे मनोरंजन के साधनों से अनजान है।

 

बन गया है राजनीतिक मुद्दा

बंजार कांग्रेस अध्यक्ष दुष्यंत ठाकुर ने कहा कि वर्तमान सरकार इन गांव के लोगों कोरे अश्वासन देकर छल रही है। कांग्रेस की सरकार आते ही यहां के लिए सुविधाएं दी जाएगी। बंजार के विधायक सुरेंद्र शौरी ने कहा कि गांव तक सडक और बिजली पहुचाने के लिए सामाधान तलाशा गया है। नेशनल पार्क के अधिकारियों से बात हो चुकी है। जल्द ही इन गांवों के लोगों की हर समस्या का समाधान निकाला जाएगा।