AI के राज में ‘कॉपी-पेस्ट’ पत्रकारिता! जब हर रिपोर्टर बन बैठा एडिटर और गली-कूचे में पैदा हो गए न्यूज़ चैनल

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते प्रभाव ने पत्रकारिता की कार्यशैली को बदल दिया है। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और AI टूल्स के दौर में पत्रकारिता के सामने नई चुनौतियां और अवसर उभरकर सामने आ रहे हैं।
AI के राज में ‘कॉपी-पेस्ट’ पत्रकारिता! जब हर रिपोर्टर बन बैठा एडिटर और गली-कूचे में पैदा हो गए न्यूज़ चैनल

डलहौज़ी हलचल : आज के डिजिटल युग में पत्रकारिता का रंग-ढंग पूरी तरह बदल चुका है। अब न तो धूप में तपने की ज़रूरत है, न ही ग्राउंड रिपोर्टिंग में पसीना बहाने की। डिग्री हाथ में हो या न हो, जेब में एक स्मार्टफोन और दिमाग में थोड़ा सा ‘AI का तड़का’ होना चाहिए—बधाई हो, आप रातों-रात एक नए न्यूज़ पोर्टल के ‘चीफ एडिटर’ बन चुके हैं!

जी हाँ, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के इस ज़माने में असली पत्रकारों से ज़्यादा तो ‘एडिटर’ पैदा हो रहे हैं, और हर रोज़ सोशल मीडिया पर नित नए न्यूज़ पेज जन्म ले रहे हैं।

 चैटजीपीटी (ChatGPT) का चश्मा और ‘प्रॉम्प्ट’ की पत्रकारिता

“ब्रेकिंग न्यूज़: सूत्रों के हवाले से बड़ी खबर…” – आज यह लिखने के लिए किसी खुफिया सूत्र या खोजी पत्रकार की ज़रूरत नहीं है। बस AI टूल के चैटबॉक्स में जाइए, लिखिए—“इस साधारण सी खबर को सनसनीखेज स्टाइल में लिखो”—और पलक झपकते ही आपकी मसालेदार खबर तैयार!

पहले एडिटर फील्ड से आई खबरों को तराशते थे, लेकिन आज के नए नवेले एडिटर AI की मदद से खबरों को ‘मैन्युफैक्चर’ कर रहे हैं। पत्रकारिता के ककहरे से अनजान लोग भी AI के सहारे ऐसी भाषा लिख रहे हैं कि बड़े-बड़े साहित्यकार भी सिर पकड़ लें।

 मशरूम की तरह उग रहे डिजिटल न्यूज़ पेज: हर घर में एक ‘प्रधान संपादक’

अगर आप फेसबुक, इंस्टाग्राम या यूट्यूब स्क्रॉल कर रहे हैं, तो आपको हर पांचवीं प्रोफाइल किसी न किसी “XYZ न्यूज़”, “पल-पल की खबर” या “सच्ची आवाज़” नाम के पेज की मिल जाएगी। इसके पीछे का पूरा गणित बेहद मजेदार है:

  • शून्य इन्वेस्टमेंट, भारी टशन: न कोई ऑफिस, न कोई भारी-भरकम कैमरा। बस एक ₹100 का माइक (जो अक्सर फोन से कनेक्ट भी नहीं होता) और हाथ में मोबाइल।

  • क्लिकबेट का खेल: AI से पूछो, “इस खबर की ऐसी हेडलाइन बताओ कि लोग क्लिक करने पर मजबूर हो जाएं।” AI आपको देगा—“देखिए कैसे बीच सड़क पर हुआ ऐसा काम, उड़ जाएंगे आपके होश!” बस, व्यूज की बारिश शुरू।

  • कॉपी-पेस्ट की जुगलबंदी: बड़े मीडिया हाउस की खबर उठाई, AI टूल में डाली, ‘रीराइट’ (Rewrite) का बटन दबाया, और अपने नए न्यूज़ पेज पर चेप दी!

 ग्राउंड जीरो गायब, AC रूम से ‘क्रांति’!

इस नए दौर की पत्रकारिता का सबसे बड़ा सच यह है कि इसमें ‘ग्राउंड रिपोर्टिंग’ वेंटिलेटर पर है।

  • बिना फील्ड में जाए ‘एक्सक्लूसिव’: धूप, धूल और जनता के बीच जाने का झंझट खत्म। एडिटर महोदय अपने AC कमरे में बैठकर चाय की चुस्की लेते हैं और AI से कहते हैं—“फलां घटना पर एक भावुक और आक्रामक आर्टिकल तैयार करो।”

  • सच्चाई और अफवाह का कॉकटेल: जब खबर खुद चलकर नहीं आती और उसे एल्गोरिदम के भरोसे बनाया जाता है, तो सच क्या है और AI द्वारा बुना गया भ्रम क्या है, यह पहचानना भगवान के भरोसे ही रह जाता है।

आखिरी बात: क्या यह पत्रकारिता का भविष्य है या तमाशा?

AI क्रांति ने बेशक हर आम इंसान को अपनी आवाज़ उठाने का मंच और लोकतंत्र का ‘चौथा स्तंभ’ बनने का शॉर्टकट दे दिया है। लेकिन इस ‘मसालेदार डिजिटल तड़के’ के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है—जब सब एडिटर ही बन जाएंगे, तो धूप में जाकर हकीकत तलाशने वाला पत्रकार कहाँ से आएगा?

फिलहाल, आप भी अपने आस-पास नजर दौड़ाइए, हो सकता है आपका पड़ोसी भी किसी नए न्यूज़ पेज के लॉन्च की तैयारी में AI से ‘प्रॉम्प्ट’ लिखवा रहा हो!

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