निरंकारी सत्संग भवन बनीखेत में गूंजा आध्यात्मिक संदेश, दुनी चंद जी बोले- सच्ची भक्ति जीवन को संवारती है
डलहौज़ी हलचल (बनीखेत) अशोक चौहड़िया : रविवार को Sant Nirankari Mission के निरंकारी सत्संग भवन बनीखेत में आध्यात्मिक सत्संग का आयोजन किया गया। इस अवसर पर प्रचार टूर कार्यक्रम के तहत पहुंचे जोनल इंचार्ज महात्मा दुनी चंद जी ने संगत को संबोधित करते हुए भक्ति, मानवता और परमात्मा के सच्चे अहसास पर प्रेरणादायक विचार साझा किए।
“भक्त हर समय निरंकार के अहसास में जीवन जीते हैं”
महात्मा दुनी चंद जी ने कहा कि युगों-युगों से यही संदेश दिया जाता रहा है कि मनुष्य अपने जीवन को सत्य की रोशनी से जोड़कर संवार ले।
उन्होंने कहा कि सच्चे भक्त हर समय निरंकार प्रभु के अहसास में जीवन व्यतीत करते हैं और मानवता की सेवा को ही सच्ची भक्ति मानते हैं।
“भक्ति के लिए संसार छोड़ना जरूरी नहीं”
उन्होंने स्पष्ट किया कि संतों ने कभी भी सामाजिक जिम्मेदारियों से भागकर भक्ति करने का संदेश नहीं दिया।
बल्कि घर, परिवार और समाज का हिस्सा बनकर भक्ति करने की प्रेरणा दी है। उन्होंने कहा कि भक्ति का कोई निश्चित समय या स्थान नहीं होता, बल्कि यह जीवन के हर क्षण में महसूस की जा सकती है।
फूल की खुशबू की तरह हो सच्ची भक्ति
दुनी चंद जी ने कहा कि जैसे फूल बिना किसी प्रयास के अपनी खुशबू फैलाता है, उसी प्रकार सच्ची भक्ति भी बिना दिखावे के जीवन में झलकती है।
उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति केवल बाहरी प्रदर्शन के लिए सत्संग में जाता है तो वह वास्तविक भक्ति से दूर रहता है।
“मन, वचन और कर्म से परमात्मा से जुड़ना ही सच्ची भक्ति”
उन्होंने कहा कि सच्ची भक्ति तब होती है जब मन, वचन और कर्म से आत्मा परमात्मा के साथ एकरूप हो जाती है।
ऐसी भक्ति से व्यक्ति के भीतर प्रेम, सेवा और मानवता का भाव स्वतः विकसित होता है, जो समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने का माध्यम बनता है।
“प्रभु को जीवन में सर्वोपरि रखें”
महात्मा दुनी चंद जी ने कहा कि परमात्मा प्रेम और करुणा का असीम स्रोत है और हर जगह समान रूप से विद्यमान है।
उन्होंने कहा कि इंसान को भौतिक सुख-सुविधाओं का उपयोग करते हुए दूसरों के सुख का कारण बनना चाहिए तथा हर परिस्थिति में परमात्मा का शुक्रिया अदा करना चाहिए।
सत्संग में मन का जुड़ना जरूरी
उन्होंने कहा कि यदि मन सत्संग से नहीं जुड़ रहा तो केवल शरीर से सत्संग में जाना व्यर्थ है।
सच्चे संत और भक्त सत्य को जानकर प्रेम और समर्पण के साथ सत्संग करते हैं और प्रेम का स्वरूप बन जाते हैं।
