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भरमौर के चौरासी मंदिर में भंडारे पर अब लगेगा शुल्क, बिना अनुमति धार्मिक आयोजन पर रोक

Dalhousie Hulchul

डलहौजी हलचल (भरमौर): ऐतिहासिक चौरासी मंदिर परिसर में अब भंडारे और अन्य धार्मिक आयोजनों के लिए शुल्क देना अनिवार्य कर दिया गया है। प्रशासन ने मंदिर परिसर की स्वच्छता बनाए रखने के उद्देश्य से यह सख्त फैसला लिया है। नए नियमों के तहत आयोजकों को पहले अनुमति लेनी होगी और निर्धारित स्वच्छता शुल्क भी जमा करना होगा। इस निर्णय के बाद स्थानीय लोगों में विरोध के स्वर तेज हो गए हैं।

प्रशासन के अनुसार यह निर्णय सुलेमान बनाम हिमाचल राज्य मामले में हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के आदेशों के अनुपालन में लिया गया है। श्री मणिमहेश न्यास की 12 मार्च को हुई बैठक में इस प्रस्ताव को सर्वसम्मति से मंजूरी दी गई। इसके तहत एक दिन के भंडारे या आयोजन के लिए 1000 रुपये और दो दिन के आयोजन के लिए 2500 रुपये स्वच्छता शुल्क तय किया गया है।

इसके साथ ही प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि किसी भी धार्मिक आयोजन के लिए कम से कम तीन दिन पहले विशेष क्षेत्र विकास प्राधिकरण (साडा) या श्री मणिमहेश न्यास से लिखित अनुमति लेना अनिवार्य होगा। बिना अनुमति किसी भी प्रकार का आयोजन नहीं किया जा सकेगा।

इस फैसले के बाद स्थानीय लोगों में नाराजगी देखने को मिल रही है। लोगों का कहना है कि पहले कभी इस प्रकार की अनुमति या शुल्क की व्यवस्था नहीं थी और यह आस्था से जुड़ा विषय है, जिस पर शुल्क लगाना उचित नहीं है। ग्राम पंचायत भरमौर के पूर्व वार्ड पंच अनीश, युवक मंडल जखन ग्रीमा के प्रधान लोकेंद्र कपूर, बजरंग दल से अनिल चाढक, पुजारी अनू शर्मा और लेख राज ठाकुर ने कहा कि शिव नुआला इस जनजातीय क्षेत्र की परंपरा है और इसमें प्रशासन की अनुमति की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि यह केवल राजस्व एकत्र करने का तरीका है और जल्द ही इस मुद्दे को लेकर प्रदेश सरकार को ज्ञापन भेजा जाएगा।

वहीं, एसडीएम भरमौर एवं सदस्य सचिव श्री मणिमहेश न्यास विकास शर्मा ने प्रशासन का पक्ष रखते हुए कहा कि मंदिर परिसर की गरिमा और स्वच्छता बनाए रखना प्राथमिकता है। उन्होंने बताया कि अक्सर भंडारों के बाद कचरा प्रबंधन सही तरीके से नहीं हो पाता, जिसके चलते यह व्यवस्था लागू की गई है। प्राप्त शुल्क का उपयोग सफाई व्यवस्था को बेहतर बनाने में किया जाएगा।

गौरतलब है कि चौरासी मंदिर परिसर भरमौर में स्थित 84 मंदिरों का प्राचीन समूह है, जिसकी स्थापना छठी शताब्दी में राजा मेरु बर्मन द्वारा की गई थी। धार्मिक मान्यता के अनुसार यह स्थान माता भरमाणी का निवास रहा है और भगवान शिव अपने 84 सिद्धों के साथ यहां ठहरे थे। मान्यता है कि मणिमहेश यात्रा पर आने वाले श्रद्धालुओं को पहले माता भरमाणी के दर्शन करना अनिवार्य होता है। यहां यमराज का मंदिर भी स्थित है।