डलहौजी हलचल (शिमला) प्रकाश चंद शर्मा : हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने निजी भूमि पर खड़े सूखे और गिरे हुए पेड़ों के कटान को लेकर अहम फैसला सुनाते हुए भू-मालिकों को बड़ी राहत दी है। अदालत ने ऊना के मंडलीय वन अधिकारी (डीएफओ) के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें निजी जमीन पर मौजूद खैर के सूखे पेड़ों को काटने की अनुमति देने से इंकार किया गया था।
न्यायमूर्ति ज्योत्स्ना रिवाल दुआ की अदालत ने कुलवंत सिंह व अन्य की याचिका पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि जब भूमि का मालिकाना हक और कब्जा पूरी तरह स्पष्ट है, तो वन विभाग तकनीकी आधारों पर अनुमति नहीं रोक सकता।
अदालत ने वन विभाग को निर्देश दिए कि दो सप्ताह के भीतर संबंधित भूमि का पुनः सीमांकन कर सूखे और गिरे हुए पेड़ों की पहचान की जाए तथा इसके बाद अगले दो सप्ताह में चिन्हित पेड़ों के कटान की विधिवत अनुमति प्रदान की जाए।
मामले के अनुसार याचिकाकर्ताओं ने अपनी निजी भूमि पर मौजूद सूखे पेड़ों को हटाने के लिए आवेदन किया था, जिसे 17 दिसंबर 2024 को डीएफओ ऊना द्वारा यह कहकर खारिज कर दिया गया कि यह भूमि पूर्व में राज्य सरकार के अधीन रही है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि वर्ष 1974 के अधिनियम के तहत यह भूमि सरकार के पास चली गई थी, लेकिन 2001 के संशोधन के बाद इसे पुनः शामलात मालिकों के नाम कर दिया गया। वर्तमान में याचिकाकर्ता ही इस भूमि के वैध स्वामी हैं।
कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि जब सरकार स्वयं भूमि वापस कर चुकी है और मालिकाना हक स्पष्ट है, तो वन विभाग द्वारा अनुमति से इंकार करना कानूनन सही नहीं है।
इस फैसले से उन भू-मालिकों को बड़ी राहत मिली है, जो वन विभाग की आपत्तियों के चलते अपनी ही जमीन से सूखे पेड़ हटाने में लंबे समय से परेशानियों का सामना कर रहे थे।

