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लाहौल की अध्यापिकाओं के जज्बे को सलाम, कोविड काल में एहतियात के साथ कायम की मिसाल
अन्य अध्यापकों के लिए बड़ी प्रेरणा है इन दोनों अध्यापिकाओं का समर्पण भाव-उपायुक्त   
 
डलहौज़ी हलचल (केलांग) : सरकारी क्षेत्र में यूं तो सभी अपने दायित्वों का निर्वहन करते हैं और ये उनसे अपेक्षित भी होता है। लेकिन कुछ शख्सियतें ऐसी होती हैं जो लीक से हटकर कार्य करते हुए ना केवल उन्हें दिए गए दायित्वों को पूरा करते हैं बल्कि अपने जज्बे और समर्पण से दूसरों को भी प्रेरणा दे जाते हैं। इसी फेहरिस्त में शामिल हैं।  जनजातीय लाहौल घाटी के  राजकीय आदर्श वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय जाहलमा में हिंदी की प्रवक्ता अनीता देवी और राजकीय प्राथमिक विद्यालय मेह में कार्यरत जेबीटी छेरिंग डोलमा।

इन दोनों अध्यापिकाओं ने कोविड-19 के दौर में बच्चों की पढ़ाई को लेकर जिस जज्बे का परिचय दिया है, उसके उदाहरण लाहौल घाटी जैसी विषम भौगोलिक परिस्थितियों वाले क्षेत्रों में तो कम देखने को मिलते हैं। इन्होंने कोविड प्रोटोकॉल का पालन करते हुए बच्चों की पढ़ाई, मार्गदर्शन और होमवर्क जांचने के काम को बखूबी अंजाम दिया। राजकीय आदर्श वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय जाहलमा की हिंदी प्रवक्ता अनीता देवी बताती हैं कि वे 2012 से एसएमसी के तहत अपनी सेवाएं दे रही हैं। वैश्विक महामारी के दौरान बच्चों की पढ़ाई पर प्रतिकूल प्रभाव देखने को मिल रहा था। लेकिन राज्य सरकार ने भी अच्छी पहल करते हुए शिक्षा विभाग को ऑनलाइन पढ़ाई की व्यवस्था शुरू करने के निर्देश दिए। लाहौल घाटी के कई गांवों में इंटरनेट की सुविधा अभी भी पर्याप्त  नहीं है, जिसके चलते ऑनलाइन शिक्षा देने में दिक्कतें पेश आ रही थीं।

लाहौल की अध्यापिकाओं  के जज्बे को सलाम

अनीता देवी ने मूरिंग और नालडा पंचायतों के इंटरनेट सुविधा से वंचित गांवों के बच्चों को उनके घर- द्वार पर जाकर शिक्षा प्रदान करने का फैसला लिया और इसे अमलीजामा भी पहनाया। इस कार्य में उन्हें 6 से 7 किलोमीटर पैदल भी चलना पड़ा। भारी बर्फबारी के बीच  ओथंग और यंगथंग गांव के बच्चों को प्रश्नपत्र पहुंचाने का दायित्व भी निभाया। वह ये भी बताती हैं कि हालांकि घर में 3 साल की बिटिया भी थी लेकिन शिक्षा ग्रहण करने वाले बच्चों की चिंता उस ड्यूटी से बड़ी लगी।

बच्चों की शिक्षा के प्रति ऐसी ही चिंता और जज्बा राजकीय प्राथमिक विद्यालय मेह में 2017 से तैनात कार्यरत जेबीटी छेरिंग डोलमा ने भी दिखाया है। जिन गांवों में नेटवर्क की सुविधा नहीं थी वहां के बच्चों को उन्होंने अभिभावकों की सहमति के बाद अपने क्वार्टर में ही पढ़ाने की व्यवस्था कायम की। चूंकि अभिभावकों ने बच्चों के होमवर्क को घर पर करवा पाने में असमर्थता व्यक्त की थी। ऐसे में  छेरिंग डोलमा के समक्ष यह चुनौती थी कि बच्चों को किस तरह से पढ़ाया जाए। पढ़ाई के अलावा उनके रहने व खाने- पीने की व्यवस्था भी उन्होंने अपने क्वार्टर में ही की। इस बात का भी पूरा ध्यान रखा गया कि कोविड प्रोटोकॉल का पालन हो और बच्चों की शिक्षा भी बिना किसी व्यवधान के पूरी हो सके। नतीजतन शिक्षा सत्र के अंत में बच्चों का शैक्षणिक कार्य सफलतापूर्वक पूरा हुआ।  दोनों अध्यापिकाओं के अपनी ड्यूटी के प्रति इस तरह के समर्पण भाव और जज्बे की जिला प्रशासन ने भी सराहना की और उन्हें 75वें  जिला स्तरीय स्वतंत्रता दिवस समारोह के मौके पर सम्मानित भी किया गया।

'लाहौल-स्पीति के उपायुक्त नीरज कुमार ने विशेष तौर से दोनों  अध्यापिकाओं के कार्यों की प्रशंसा करते हुए कहा कि इनका समर्पण भाव अन्य अध्यापकों के लिए भी एक बहुत बड़ी प्रेरणा है। स्कूल में शिक्षा ग्रहण करने वाले ये विद्यार्थी हमारे समाज की भविष्य की पीढ़ी भी है। यदि आज उनके वर्तमान को इस तरह संवारा जाएगा तो उनका भविष्य भी उज्जवल होगा।'

लाहौल की अध्यापिकाओं  के जज्बे को सलाम