दिव्यांगजनों के अधिकारों की सुरक्षा को बड़ा कदम, 7 नए मामलों में कानूनी संरक्षक नियुक्त करने को मंजूरी

शिमला में राष्ट्रीय न्यास अधिनियम 1999 के तहत 7 दिव्यांगजनों को कानूनी संरक्षक प्रदान करने की मंजूरी दी गई। उपायुक्त अनुपम कश्यप ने मामलों में देरी न करने के निर्देश दिए।
दिव्यांगजनों के अधिकारों की सुरक्षा को बड़ा कदम, 7 नए मामलों में कानूनी संरक्षक नियुक्त करने को मंजूरी

डलहौज़ी हलचल | शिमला

राष्ट्रीय न्यास अधिनियम, 1999 के तहत गठित स्थानीय स्तरीय समिति (एलएलसी) की बैठक उपायुक्त कार्यालय में आयोजित की गई। बैठक की अध्यक्षता उपायुक्त अनुपम कश्यप ने की। बैठक में दिव्यांगजनों के हितों और अधिकारों की सुरक्षा से जुड़े विभिन्न मामलों पर चर्चा की गई।

7 नए आवेदनों को मिली मंजूरी

बैठक में बताया गया कि जिला शिमला में वर्तमान में 108 दिव्यांगजनों के लिए कानूनी संरक्षक नियुक्त किए जा चुके हैं। वहीं हाल ही में प्राप्त 7 नए आवेदनों पर विचार करने के बाद समिति ने उन्हें भी मंजूरी प्रदान कर दी है।

इस निर्णय से संबंधित दिव्यांगजनों को उनके व्यक्तिगत, सामाजिक और वित्तीय मामलों के बेहतर प्रबंधन में सहायता मिलेगी।

दिव्यांगजनों के अधिकारों की रक्षा के लिए बना है अधिनियम

उपायुक्त अनुपम कश्यप ने बताया कि राष्ट्रीय न्यास अधिनियम, 1999 का उद्देश्य ऑटिज्म, सेरेब्रल पाल्सी, बौद्धिक दिव्यांगता (मानसिक मंदता) तथा बहु-विकलांगता से ग्रस्त व्यक्तियों के अधिकारों और हितों की रक्षा करना है।

उन्होंने कहा कि अधिनियम के तहत ऐसे दिव्यांग व्यक्तियों की देखभाल, सुरक्षा तथा संपत्ति के प्रबंधन के लिए कानूनी संरक्षक नियुक्त करने का प्रावधान किया गया है।

कौन कर सकता है संरक्षक बनने के लिए आवेदन

उपायुक्त ने बताया कि जब कोई दिव्यांग व्यक्ति स्वयं अपने व्यक्तिगत, सामाजिक या वित्तीय मामलों का प्रबंधन करने में सक्षम नहीं होता, तब उसके माता-पिता, रिश्तेदार अथवा अन्य उपयुक्त व्यक्ति कानूनी संरक्षक बनने के लिए आवेदन कर सकते हैं।

यह आवेदन जिला स्तर पर गठित स्थानीय स्तरीय समिति के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है, जहां सभी दस्तावेजों और परिस्थितियों की जांच के बाद निर्णय लिया जाता है।

संरक्षक की होती है महत्वपूर्ण जिम्मेदारी

उन्होंने कहा कि नियुक्त संरक्षक का दायित्व दिव्यांग व्यक्ति के स्वास्थ्य, शिक्षा, पुनर्वास, आवास तथा संपत्ति से जुड़े मामलों की देखभाल करना होता है। साथ ही यह सुनिश्चित करना भी आवश्यक होता है कि लिए गए सभी निर्णय दिव्यांग व्यक्ति के सर्वोत्तम हित में हों।

यदि कोई संरक्षक अपने दायित्वों का सही ढंग से निर्वहन नहीं करता या दिव्यांग व्यक्ति के हितों की उपेक्षा करता है, तो स्थानीय स्तरीय समिति उसके विरुद्ध कार्रवाई कर सकती है और आवश्यकता पड़ने पर नए संरक्षक की नियुक्ति भी कर सकती है।

मामलों के निस्तारण में न हो देरी

उपायुक्त अनुपम कश्यप ने अधिकारियों को निर्देश दिए कि कानूनी संरक्षक की नियुक्ति से जुड़े मामलों के निस्तारण में किसी भी प्रकार की अनावश्यक देरी नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि यह व्यवस्था दिव्यांगजनों के अधिकारों, सुरक्षा और गरिमा को सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

विज्ञापन