पिता को बचपन में खोया, मां से छिपाकर जापान गईं सीमा, फिर एशियन गेम्स में रचा इतिहास

चंबा की बेटी सीमा कुमारी की कहानी सिर्फ एक कांस्य पदक की कहानी नहीं, बल्कि संघर्ष, जुनून और हौसले की कहानी है। रेटा गांव से निकलकर जापान के एशियन गेम्स ट्रैक तक पहुंचीं सीमा ने 10 हजार मीटर दौड़ में कांस्य पदक जीतकर भारत को 16 साल बाद इस स्पर्धा में पदक दिलाया। मां को भी नहीं बताया था कि वह जापान जा रही हैं… पूरी कहानी पढ़िए।
पिता को बचपन में खोया, मां से छिपाकर जापान गईं सीमा, फिर एशियन गेम्स में रचा इतिहास

डलहौज़ी हलचल (चंबा) :  हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले के चुराह क्षेत्र के छोटे से गांव रेटा से निकलकर एशियन गेम्स के पोडियम तक पहुंचने वाली धाविका सीमा कुमारी की कहानी संघर्ष, हिम्मत और जुनून की मिसाल है। 2026 एशियन गेम्स में जापान के आइची-नागोया में महिलाओं की 10,000 मीटर दौड़ में सीमा ने 32 मिनट 50.05 सेकेंड के समय के साथ कांस्य पदक जीतकर इतिहास रचा।

सीमा की उपलब्धि इसलिए भी खास है क्योंकि भारत को महिलाओं की 10,000 मीटर दौड़ में एशियन गेम्स पदक के लिए 16 साल का इंतजार करना पड़ा। इससे पहले भारत ने इस स्पर्धा में 2010 में पदक जीते थे। सीमा इस स्पर्धा में पदक जीतने वाली तीसरी भारतीय महिला बनी हैं।

बचपन में पिता को खोया, फिर भी नहीं छोड़ी दौड़

सीमा का बचपन चंबा के दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र में बीता। परिवार के लिए परिस्थितियां आसान नहीं थीं। कम उम्र में पिता के निधन के बाद परिवार की जिम्मेदारियां बढ़ गईं। इसके बावजूद सीमा ने खेल के प्रति अपना जुनून नहीं छोड़ा।

परिवार के मुताबिक, सीमा को बचपन से ही दौड़ने का शौक था। उन्होंने स्कूली दिनों से ही दौड़ना शुरू कर दिया था। सीमित संसाधनों के बावजूद वह गांव के छोटे मैदान और सड़कों पर अभ्यास करती थीं।

11 साल की उम्र में घर से दूर शुरू की ट्रेनिंग

सीमा के करियर में बड़ा मोड़ तब आया जब उनका चयन स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (SAI) के धर्मशाला हॉस्टल के लिए हुआ। यहां उन्हें बेहतर प्रशिक्षण और सुविधाएं मिलीं। वर्ष 2015 में उन्होंने जूनियर नेशनल एथलेटिक्स चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक भी जीता।

इसके बाद सीमा ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार अपनी पहचान बनाई और लंबी दूरी की दौड़ में भारत की प्रमुख धाविकाओं में शामिल हुईं।

मां को नहीं बताया कि जापान जा रही हैं

सीमा की एशियन गेम्स यात्रा से जुड़ा एक भावुक पहलू यह भी है कि उन्होंने अपनी बुजुर्ग मां को जापान जाने की जानकारी नहीं दी थी।

रिपोर्टों के अनुसार, सीमा को डर था कि उनकी मां चिंता करेंगी और उनकी तबीयत पर इसका असर पड़ सकता है। लेकिन उनकी मां ने टीवी पर अपनी बेटी की दौड़ देखी और उसके ऐतिहासिक प्रदर्शन की गवाह बनीं।

पदक जीतने के बाद सीमा की मां भावुक हो गईं। उन्होंने कहा कि अगर सीमा के पिता आज जीवित होते तो अपनी बेटी की इस उपलब्धि पर बेहद खुश होते।

मुश्किल हालात में भी नहीं रुकी सीमा

सीमा का सफर आधुनिक सिंथेटिक ट्रैक से नहीं, बल्कि चंबा के पहाड़ी रास्तों और छोटे स्कूल मैदान से शुरू हुआ था। परिवार के अनुसार, संसाधनों की कमी के बावजूद उन्होंने अभ्यास जारी रखा और धीरे-धीरे राष्ट्रीय स्तर पर अपनी जगह बनाई।

जापान में भी उनकी परीक्षा आसान नहीं थी। 10,000 मीटर की कठिन दौड़ में उन्होंने अंतिम चरण तक मुकाबला बनाए रखा और 32:50.05 के समय के साथ कांस्य पदक अपने नाम किया।

चंबा की बेटी ने खत्म किया 16 साल का इंतजार

सीमा कुमारी का कांस्य पदक सिर्फ उनके परिवार और चंबा के लिए ही नहीं, बल्कि भारतीय एथलेटिक्स के लिए भी महत्वपूर्ण उपलब्धि है। महिलाओं की 10,000 मीटर स्पर्धा में भारत को पिछली बार 2010 एशियन गेम्स में पदक मिला था। सीमा के कांस्य ने इस लंबे इंतजार को खत्म किया।

चंबा के रेटा गांव की पगडंडियों से जापान के एशियन गेम्स ट्रैक तक पहुंची सीमा कुमारी की कहानी बताती है कि सीमित संसाधनों के बावजूद मजबूत इरादा और लगातार मेहनत किसी खिलाड़ी को अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचा सकती है।

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